बालकपन में साथ पढ़े थे

बालकपन में साथ पढ़ै थे या बात पुराणी के जाणै
धनवाले ना मीत किसी के प्रीत निभाणी के जाणै
बालकपन में साथ पढ़ै थे.......

मैं जाणु था धन देवगा श्री कृष्ण सै यार मेरा
न्यू सोची थी दया करैगा साथी सै साहूकार मेरा
मानी कोन्या आवण का था कोन्या कोई विचार मेरा
पंडितानी मेरी देखती होगी कद आवे भरतार मेरा
खाली हाथ चल्या मैं उल्टा न्यु मिस्राणी के जाणै
धनवाले ना मीत किसीके प्रीत निभाणी के जाणै
बालकपन में साथ पढ़ै थे.......

हीरे मोती भरे पड़े थे ताले ताली सोने की
देग टोकनी चाँदी की और लोटा थाली सोने की
कणि मणि कमरा महँ जड़ रहीं लग रही जाली सोने की
आठों राणी पहर रहीं थीं कंगन बाली सोने की
हाय कंगाली के हो सै कर किशन की पटराणी के जाणै
धनवाले ना मीत किसीके प्रीत निभाणी के जाणै
बालकपन में साथ पढ़ै थे.......

झूठा ढ़ोंग दिखावें का करके गले लाग्या मेरै रो के नै
चंदन चौकी पै बिठलाया पैर मेरे धो धो के नै
सूखे चावल खाण लागग्या कितना राजी होके नै
पैर दाबता पाया जद मैं उठया सबेरे सो के नै
जिसनें देखें दुःख कोन्या वो विपत बेगाणी के जाणै
धनवाले ना मीत किसीके प्रीत निभाणी के जाणै
बालकपन में साथ पढ़ै थे.......

अपणे घर जद आया सुदामा महल खड़े थे कंचन के
भरे ख़जाने हीरे मोती लाल जवाहर रतन धन के
देख यार का चमत्कार गुण गायें रहा यदुनंदन के
जीवन भर न भूलू मैं एहसान कभी श्री कृष्ण के
जैसी प्रीत निभायी श्याम ने कोई और निभाणी के जाणै
कोई  और निभाणी के जाणै.......
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