ओ छलियाँ खूब छला

ओ छलियाँ खूब छला,
मेरा ऐसा किया भला,
मैं तन मन फूक चला,
तेरे दर से जब निकला,
ये सोचा घड़ी दुःख की टल जाएगी,
दया से तेरी ये किस्मत मेरी बदल जाएगी,

मीत तूने प्रीत की ये खूब कदर जानी,
सारी यारी पे तूने फेर दिया पानी,
आया था सोच कर तू दवारिका दीस है,
देगा खजाना मेरा यार जगदीश है,
दर पे आया धोखा खबर क्या थी किस्मत धागा खाये गई,
तेरी दोस्ती भी आंसू कभी यु बरसाए गी,
ओ छलियाँ खूब छला........

कहते है दुःख में कोई यार नहीं होता कभी महल से झोपड़ी का प्यार ही होता,
कब रंक राजा के दिल होये है करीब के,
कब धन वाले हुए मीत ये गरीब के,
तूने सदा सुनली कहा सबल से निर्बल की न बन पये गी,
फिर तुम को ही क्यों सुदामा पे यु दया आये गी,
ओ छलियाँ खूब छला,


यारा वो जो सुख दुःख में शामिल हो जाते है,
उधर दर्द हो इधर नीर नैना बरसते है,
ऐसी ना रीत तूने प्रीत की निभाई रे,
या मैंने यार तेरी देख ली खुदाई रे
गम की घटा ना हो सदा,
कभी तो फसल सुख की सरसाये गी,
गाजेसिंह की खिजा ज़िंदगी वी मुस्काये गी,
ओ छलियाँ खूब छला,
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