विघन विनाशत विघन हरत गणपति श्री गणेश

हरी ॐ
ईक औंकार को सिमरिऐ, मिट जाऐ सभी कलेश,
विघन विनाशत विघन हरत गणपति श्री गणेश ॥

भगवती संग पुजिऐ श्री बह्ममा विषणु महेश,
गुरू दासों का दास हुँ मोरे अंग संग रहो हमेश ॥

सरस्वती स्वर दिजिऐ स्वर के साथ ञान,
मै बेसुर बेताल हुँ मैय्या आप करो कल्याण ॥

मोरी रखियो लाज गुरू देव देव,
मोरी रखियो लाज गुरू देव -॥

बाबे मेरे हाल दा महरम तु,
अंदर तु है बाहर तु है मेरे रोम रोम विच तु ॥
तु ही ताना तु ही बाना,
सब किछ मेरा तु वे सांईया सब किछ मेरा तु ॥
कह हुसेन फकिर सांई दा, मै नाहीं सब तु ॥

ख्वाजा जी महाराजा जी -॥ तुम बनो गरीब निवास,
अपना कर के राखियो तोहे बाहं पकडे की लाज ॥

रह मन संसार मे सबसे मिलिऐ ध्याऐ,
ना जाने की भेस मे मोहे नारायण मिल जाऐ ॥

ञान ध्यान कुछ कर्म ना जाना सार ना जाना तेरी,
सबसे वड़ा धन सतगुरू नानाक जिन कल राखि मेरी ॥

जे मै वेखा अमला वले कुछ नहीं पले मेरे,
जे मै वेखां तेरी रहमत वले बल्ले बल्ले ॥
हरी ॐ........
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