बृजवासी कान्हा थारी

बृजवासी कान्हा थारी तो बंसी सब जग मोहनी....

जबसे भनक पड़ी कानन में झपके आन खड़ी आंगन में,
बिजली सी चमके तन मन में बंसी है दुख खोवनी,
बृजवासी कान्हा थारी तो बंसी सब जग मोहनी....

घर को छोड़ चली ब्रिज वाला सुध बुध त्यागी भाई बेहाला,
अब तो दर्शन दो नंदलाला डस गई नागिन मोहनी,
बृजवासी कान्हा थारी तो बंसी सब जग मोहनी....

ब्रह्मा वेद ध्यान शिव त्यागे जीव जंतु पक्षी सब जागे,
रास रचायो गोपियों के सागै सूरत थारी सोहनी,
बृजवासी कान्हा थारी तो बंसी सब जग मोहनी....

यमुना नीर धीर भयो सारो चरती गायछोड़ दियो चारों,
भगत थारा दर्शन को प्यासे फेर जन्म नही होवणो,
बृजवासी कान्हा थारी तो बंसी सब जग मोहनी....
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