बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ

बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ,
भवनिधि पार उतारौ,
बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ॥

काम क्रोध मद लोभ मोह सँग,
केहि विधि करों गुजारौ,
भाँति भाँति के पाप कर्म  ते,  
ह्वै गओ तन-मन कारौ,
बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ॥

परहित कबहुँ भयो न  मोपै,  
स्वारथ में तन गारौ,
कुटिल, कुचाल, नीच, निन्दारत,
पातक सदा पिआरौ,
बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ॥

हों अनाथ अघपुंज जनम कौ,  
कबहुँ न नाम उचारौ,
राधा-प्रियतम गिरधर मोरे,  
अवगुन चित न धारौ,
बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ॥

दीनानाथ पतितपावन पन,
निज मन माहिं बिचारौ,
गणिका, गीध, अजामिल तारे,  
अबकी मोहि उबारौ,
बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ॥

गई बहुत थोरी सी रह गई,  
अब तौ नाथ निहारौ,
काके द्वार जाय समदरसी,  
श्याम 'अशोक' तिहारौ,
बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ॥
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