मेरे मन में निर्मल गंगा

मेरे मन में निर्मल गंगा हो,
तन श्याम के रंग में रंगा हो,

सुख-दुख की कोई परवाह न हो,
नित ध्यान हो बस श्री चरणों का,
प्रभु भक्ति के प्रेम सुधा रस में,
इस दुनियां का भी ध्यान न हो,

मन प्रेम उमंग में डूबा रहे,
बंसी की धुन हो कानों में,
प्रभु राम की मूरत नैनों में,
हनुमंत लाल की सेवा हो,

सब अपने कोई पराया न हो,
जीवन में भय का साया न हो,
बस प्रभु की कृपा हो जीवन में,
नित भक्ति की  शीश पे छाया हो,

-अर्द्धचंद्रधारी राम त्रिपाठी
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