शिव शंकर मेरे शम्भू नाथ रे

शिव शंकर मेरे शम्भू नाथ रे,
तीनो लोक में महिमा अप्रम पार रे,

सिर माथे चंदा रमा की चमकार रे,
तेरी जटा से निकले गंगा की धार रे,
शिव शंकर मेरे शम्भू नाथ रे,
तीनो लोक में महिमा अप्रम पार रे,

देवो के देव मेरे शिव दातारि है,
हाथो में जिसके डमरू त्रि नेत्र धारी है,
शिव कल्याण कारी महात्रिपुरारी है,
रुदर रूप धारण करते तो विनाशकारी है,
जिसके तांडव से आये भूचाल रे,
देव लोक बचाया किया विष पान रे,
सब देवो ने करि इनकी फिर जय जय कार रे,
तीनो लोक में महिमा अप्रम पार रे,

नंदी की सौगंध तुम्हे वास्ता कैलाश का,
भुजने न देना दिया मेरे विश्वाश का,
प्राण पखेरू कही प्यासा उड़ जाए न,
कोई तेरी करुणा पर ऊँगली उठाये न,
विक्शा मांगू भोले हो जान कल्याण रे,
ईशा करदे पूरी हो गंगा ाशनं रे,
हट लगा कर बैठा मैं भी आज ठान रे,
तीनो लोक में महिमा अप्रम पार रे,

घनघोर अँधेरा जन जीवन से दूर है,
समसान में भी रहते मृत्यु का गरूर है,
व्यापक है शिव सृष्टि में शिव सत्ये दोनों एक है,
नथो के नाथ शम्भू रूप अनेक है,
दुनिया के दानी बर्फानी सरकार रे,
भरता झोली खाली झुकता जो दरबार रे,
अभिषेक की भी दी किस्मार सवार रे,
लिखता भजन तेरे सूरज बार बार रे ,
शिव शंकर मेरे शम्भू नाथ रे,
तीनो लोक में महिमा अप्रम पार रे,
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