मैं तो अपने मोहन की प्यारी साजन मेरो गिरधारी,

मैं तो अपने मोहन की प्यारी साजन मेरो गिरधारी,

कौन रूप कौन रंग अंग शोभा काहू सखी,
काबू न देखि शवि वो निराली है,
तन मन धन वारी संवारी सूरत वारी,
माधुरी मूरत तीनो लोक से प्यारी है,
मुकुट लटक थारो लगे मत वालो है,
तेन सेन बेन जग उझारो है,
एसो है मेरो गिरधारी,
मैं तो अपने मोहन.............

आके माथे पे मुक्त देख चंद्रिका चटक देख,
तेरी शवि की लटक देख रूप रस पी जिए,
लोचन विशाल देख गले गूंज माल देख,
अजर सुहाल देख नैन रस ली जिए,
पिताम्वर की और देख मुरली की और देख,
संवारे की देख और देखते ही रिजिये,
एसो है मेरो गिरधारी,
मैं तो अपने मोहन.............

को कहू कुल ताकू लीन अप्लीन को,
को कहू रंकन कलंकन नारी हु,
कैसा देव लोक परलोक तिरलोक मैं तो,
तीनो ही लोक अलोक लोक लिंकन से नयारी हु,
तन काजू धन ताजू देव गुरु जन ताजू,
देख क्यों न जाऊ नैन संवारे पर वारी हु
एसो है मेरो गिरधारी,
मैं तो अपने मोहन.............

गगन मंगन चंदर मम छाल टी है ,
लाखो लाखो तारे जाके दीपक दरबार है
ब्रम्हा हु वजीर विष्णु कारदार जाके,
शंकर दीवान ताके  इन्दर जामदार है,
कही अब दूत जाहे समज विचार देखो
लक्ष्मी चरण ओको वेद भंडारी है,
एसो है मेरो गिरधारी,
मैं तो अपने मोहन.............
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